ऑगनवाड़ी केन्द्र में पंजीकृत किशोरी, गर्भवती तथा धात्री माताओं की जागरूकता का समीक्षात्मक अध्ययन (रीवा नगर के विशेष संदर्भ में)
डॉ0 मधुलिका श्रीवास्तव1, प्रतिभा सिंह2
1सहायक प्राध्यापक (समाजशास्त्र) शास. ठा. रण. सिंह महाविद्यालय रीवा (म0प्र0)
2शोधार्थी (समाजशास्त्र) शास. ठा. रण. सिंह महाविद्यालय रीवा (म0प्र0)
*Corresponding Author E-mail:
ABSTRACT:
महिलाओं एवं बच्चों के समुचित विकास को ध्यान में रखकर ही 2 अक्टूबर 1975 को राष्ट्रपिता महात्मा गॉधी के 106 वें जन्म दिवस पर शुरू किया गया। आई.सी.डी.एस. कार्यक्रम‘ मानव संसाधन विभाग मंत्रालय’ के महिला एवं बाल विकास विभाग के द्वारा चलाया जा रहा देश का सबसे बड़ा और बहुभायामी कार्यक्रम है। और उसका केन्द्र विन्दु आंगनवाड़ी केन्द्र है, उस समय से लेकर वर्तमान तक 208 शोध पत्रओं के माध्यम से हमारे समाज की सर्वाधिक उपेक्षित एवं कमजोर वर्ग तक इसका लाभ पहुँच रहा है। आँगनबाडी केन्द्र इस सम्पूर्ण संरचना की प्राथमिक इकाई है। इसका संचालन सामान्यतः ग्रामीण एवं शहरी इलाके में 1000 की जनसंख्या पर एक आंगनवाडी केन्द्र स्थापित किए जाने का प्रावधान है। प्रदेश में संचालित 453 बाल विकास शोध पत्र के अन्तर्गत कुल 78929 आंगनबाड़ी केन्द्र एवं 12070 मिनी आंगनबाड़ी केन्द्रों में स्वीकृत है। उक्त स्वीकृत आंगनवाड़ियों में लगभग 80 लाख हितग्राहियों को पूरक पोषण आहार से लाभान्वित किया जा रहा है। ऑगनबाडियों को पूरक पोषण आहार में लाभान्वित किया जा रहा है। ऑगनवाडी केन्दों में पूरक पोषण आहार की व्यवस्था हेतु व्यय की जाने वाली राशि से 50 प्रतिशत की राशि भारत सरकार महिला विकास विभाग द्वारा उपलब्ध कराई जाती है।
KEYWORDS: आंगनबाड़ी, महिला एवं बाल विकास, पोषण आहार, शासकीय योजनाएंँ।
प्रस्तावना -
शासन द्वारा महिलाआंे तथा बच्चांे के समग्र विकास हेतु यह कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इस योजना के अन्तर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में 1000 की आबादी पर तथा आदिवासी क्षेत्रों मे 700 की आबादी पर 1 आंगनबाड़ी केन्द्र्र संचालित कर इन केन्द्रों के माध्यम् से शन्य से छः वर्ष के बच्चों तथा गर्भवती व शिशुवती महिलाआंे को छः सेवाएं दी जाती हैं।
ऑगनबाड़ी केन्द्रों के माध्यम से शहरी तथा ग्रामीण दोनांे क्षेत्रों की महिलाओं एवं बच्चों में पोषण आहार तथा स्वास्थ्य के देख-रेख के साथ कुपोषण नियंत्रण की दिशा में एक सकारात्मक व अहम भूमिका ‘‘महिला बाल विकास’’ की रहती है। इसी विभाग द्वारा ऑगनबाड़ी केन्द्रों का संचालन किया जाता है जो सजग पहरी की तरह उन क्षेत्रों की महिलाओं, बच्चों, किशोरियों और गर्भवती तथा धात्री माताओं को निरंतर पूरक पोषण आहार प्रदान करती है साथ ही अनेक बीमारियों के लिए रक्षात्मक टीके व शाला पूर्व अनौपचारिक शिक्षा प्रदान करती है।
ऑगनबाड़ी केन्द्रों के माध्यम से भारत सरकार द्वारा निर्धारित नवीन मापदण्ड अनुसार राज्य सरकार द्वारा 06 माह से 06 साल तक के बच्चों एवं गर्भवती। धात्री माताओं, कुपोषित बच्चों को प्रति हितग्राही प्रतिदिन पूरक पोषण आहर दिये जाने का प्रावधान किया गया है।
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12 & 15 xzke |
500 |
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20 & 25 xzke |
800 |
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18 & 20 xzke |
600 |
06 माह से 03 वर्ष तक के बच्चों, गर्भवती, धात्री माताओं एवं किशोरी बालिकाओं को एम.पी.एग्रो के माध्यम से वर्तमान में प्रदेश में संचालित आंगनवाड़ी केन्द्रा में नवीन व्यवस्था के अनुसार साथ सामग्री अलग-अलग दिवसों में दी जा रही है।
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04 |
05 |
06 |
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1- |
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18-47 |
639-80 |
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2- |
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150 xzke |
18-14 |
626-93 |
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3- |
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120 xzke |
12-28 |
503-04 |
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4- |
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120 xzke |
14-69 |
500-19 |
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5- |
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20-44 |
500-79 |
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150 xzke |
25-55 |
625-94 |
ऑगनबाडी केन्द्र में उपलब्ध कराई जाने वाली सेवाओं का मुख्य उद्देश्य समाज के पिछडे़ समाज के पिछडे़ वर्गो का पोषण एवं स्वास्थ्य लाभ पहुॅचाना है। केन्द्र में लाभान्वित किशोरी गर्भवती, धात्री तथा 6 वर्ष तक के बच्चे होते है। शोधार्थी अपने शोध विषय में किशोरी, गर्भवती तथा धात्री माताओं की जागरूकता का अध्ययन का विषय चुना है अर्थात इनकी जागरूकता से पहले हमें यह जान लेना चाहिए कि हम किशोरी, गर्भवती तथा धात्री माताएॅ किसे कहेंगे?
11 से 18 वर्ष की बालिका को किशोरी कहा जाता है तथा इस अवस्था में महत्वपूर्ण शारीरिक मानसिक एवं भावनात्मक परिवर्तन होते है। और एक किशोरी के स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए क्योंकि यही भविष्य की माताएॅ है। जिन पर आने वाली पीढ़ी का स्वास्थ्य निर्भर करता है। अतः स्वास्थ्य बच्चे को जन्म देती है।
गर्भावस्था में स्त्री को अपने शरीर के साथ-साथ गर्भ में पल रहे भू्रण को भी पोषण कराना पड़ता है। अतः उसकी पोषक तत्वों की मॉग सामान्य स्त्री से अधिक होती है और उस अवस्था में यदि उसका पर्याप्त ध्यान रखा जाए तो वह स्वस्थ रहते हुए स्वस्थ्य बच्चे को जन्म देगी।
अध्ययन का उद्देश्य:-
मानव एक सामाजिक प्राणी है। समाज में ही रहकर वह समाज के साथ जो भी क्रियाएॅ करता है जिसका कोई न कोई निश्चित उद्देश्य होता है क्योंकि उद्देश्य के बिना कार्य सफल नहीं होता है और उस कार्य का सार्थक परिणाम नही निकल पाता है। अतः उद्देश्य का स्पष्ट विवरण शोध पत्र कार्य के आधार भूत महत्व रखता है। क्योंकि उसमें यह निश्चित किया जा सकता है कि कौन से समंक एकत्रित करते है, संकलित समंकों की क्या विशेषता है एवं किन समंकों के कहां से संकलित किया जाना है।
1ण् ऑगनबाडी केन्द्रों से मिलने वाली विविध सुविधाओं की जानकारी प्राप्त करना।
2ण् महिलाआंे के स्वास्थ्य के क्षेत्र में ऑगनवाड़ी केन्द्रों के प्रयासों की जानकारी प्राप्त करना।
3ण् गर्भवती महिलाओं के प्रशव हेतु उपयुक्त स्थान के चुनाव के संबंध में जागरूकता का अध्ययन करना।
4ण् महिलाओं में कुपोषण के प्रमुख कारणों की जानकारी प्राप्त करना।
5ण् प्रसूता द्वार शिशु स्तनपान कराने से संबंधित जागरूकता का अध्ययन।
अध्ययन की आवश्यकता एवं महत्व:-
महिलाओं में संबंधित इतिहास का अध्ययन करने से पता चलता है कि उनकी स्थिति में कितना परिवर्तन आया है और उनके लिए शासन, द्वारा संचालित योजनाओं का उन्हें कितना लाभ प्राप्त हो रहा है या अपेक्षित सुधार न होने के क्या कारण है? अथवा वह स्वयं के लिए चलायी जा रही योजनाओं के संबंध में कितनी जागरूक है।
शोधार्थी उपर्युक्त वर्णित प्रश्नों के आधार पर स्पष्ट करने की कोशिश किया है कि अध्ययन का विषय वर्तमान समय में अति आवश्यक व महत्वपूर्ण है। क्योंकि समाज में जब तक किसी योजना विशेष की सम्पूर्ण जानकारी लाभार्थी या सामाजिक प्राणी प्राप्त नहीं कर लेते तब तक वह इसका लाभ प्राप्त नहीं कर सकते। शोधार्थी द्वारा चयनित किए गए अध्ययन विषय के महत्व को निम्न विन्दुओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता हैः-
1) ऑगनबाडी़ केन्द्र में पंजीकृत किशोरी, गर्भवती तथा धात्री माताओं के लिए स्वास्थ्य व पोषण संबंधी प्राप्त सुविधाओं से संबंधित जानकारी का अध्ययन।
2) आंगनवाड़ी केन्द्रों द्वारा उपलब्ध सामग्री हितग्राहियों को समय पर मिलती है या न कि आदि को प्रस्तुत लघु शोध पत्र कार्य द्वारा स्पष्ट करना है।
3) महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा उस विभाग में जो कदम उठाये गये है इन सभी जानकारियों को स्वयं हितग्राहियों से प्रत्यक्ष संपर्क व साक्षात्कार द्वारा प्राप्त करना।
उपर्युक्त बिन्दुओं से स्पष्ट हो जाता है कि शोधार्थी का विषय काफी रूचिकर और महत्वपूर्ण है। तथा शोधार्थी के मनोभाव व जिज्ञासा वर्तमान समय में सार्थक और सही है।
प्रस्तुत शोध पत्र कार्य के इस अध्याय में समंकों का संकलन एवं विश्लेषण किया गया है। जिसके आधार पर ही शोध से संबंधित विविध प्रश्नों के अभीष्ट उत्तर को प्राप्त करने के साथ ही शोध परिकल्पनाओं का परीक्षण और सत्यापन किया गया है। साक्षात्कार अनुसूची के माध्यम से संग्रहित जानकारी को एकत्र कर विश्लेषण किया गया है।
तालिका क्रमांक 1 विवाह की सही उम्र संबंधी विचार
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Ø- |
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izfr'kr |
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1- |
16&18 o"kZ |
03 |
15% |
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2- |
18&20 o"kZ |
05 |
25% |
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3- |
20&24 o"kZ |
08 |
40% |
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4- |
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04 |
20% |
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20 |
100% |
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उपर्युक्त तालिका क्रमांक 4.1 के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि 03 उत्तरदाता शादी की सही उम्र 16-18 को मानती है जिनका प्रतिशत 15 है और 05 उत्तरदाता 18-20 वर्ष की उम्र को सही मानते है। जिनका प्रतिशत 25 है और 08 उत्तरदाता जो 20-24 वर्ष की उम्र को सही मानते है। जिनका प्रतिशत 40 है और 04 उत्तरदाता उससे भी ज्यादा उम्र होनी चाहिये। जिनका प्रतिशत 20 है। अर्थात् ज्यादा उत्तरदाता 20-24 के बीच विवाह की सही उम्र बताते है।
तालिका क्रमांक 2 आंगनवाड़ी केन्द्र के माध्यम से प्रशिक्षण संबंधी विचार
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Ø- |
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1- |
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15 |
37-5% |
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2- |
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25 |
62-5% |
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40 |
100% |
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उपर्युक्त तालिका विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि आंगनबाड़ी में प्रशिक्षण प्राप्त संबंधी विचार जाना गया तो 15 उत्तरदाताओं ने विचार चक्र दिया कि प्रशिक्षण कराया जाता है लेकिन 25 उत्तरदाताओं ने बताया कि कोई प्रशिक्षण प्राप्त नहीं कराया जाता है। जिन का प्रतिशत 62.5 प्रतिशत है। अर्थात् आंगनबाड़ी केन्द्रों में अब भी प्रशिक्षण संबंधी व्यवस्था की कमी है।
तालिका क्रमांक 3 आंगनवाड़ी में पंजीकृत गर्भवती माताओं के लिये सुविधाओं के संबंध में जानकारी
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Ø- |
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1- |
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16 |
40% |
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2- |
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24 |
60% |
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40 |
100% |
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उपर्युक्त तालिका विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि आंगनबाड़ी केन्द्र में पंजीकृत गर्भवती माताओं से उनके लिये प्राप्त सुविधाओं के संबंध में जानकारी प्राप्त की तो 16 उत्तरदाताओं ने बताया कि उन्हें जानकारी है जिनका प्रतिशत 40 है। और जिन्हें इन सुविधाओं की जानकारी नहीं है। उनकी सुविधाओं की जानकारी नहीं है उनकी संख्या 24 है जिसका प्रतिशत 60 प्रतिशत है। अर्थात् उपर्युक्त विश्लेषण के आधार पर हम कह सकते है। कि योजनाओं के संबंध में लाभार्थियों को जानकारी का प्रतिशत कम है।
तालिका क्रमांक 4 आंगनवाड़ी द्वारा प्राप्त लाभ के संबंध में जानकारी
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Ø- |
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1- |
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10 |
25% |
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2- |
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30 |
75% |
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;ksx |
40 |
100% |
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उपर्युक्त तालिका विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि आंगनबाड़ी केन्द्रों के माध्यम से सेवाओं का लाभ प्राप्त होता है तो 10 लाभार्थियों ने बताया कि उन्हें लाभ प्राप्त होता है। जिनका प्रतिशत 25 है और 30 लाभार्थियों ने बताया कि उन्हें कोई लाभ प्राप्त नही होता जिनका प्रतिशत 75 प्रतिशत है। अर्थात् आंगनवाड़ी द्वारा योजनाओं का क्रियान्वयन तो किया जाता है लेकिन पूर्णतः नहीं किया जाता है।
तालिका क्रमांक 5 टीकाकरण के संबंध में विचार
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Ø- |
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1- |
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0 |
0% |
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2- |
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38 |
95% |
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3- |
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02 |
05% |
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40 |
100% |
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उपर्युक्त तालिका विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि टीकाकरण गर्भावस्था के दौरान किसे दिये जाते है तो 38 लाभार्थियों ने बताया कि टिटनेस एक्साइड के लगाये जाते है। जिनका प्रतिशत अंक है 95 और पता नहीं 02 लाभार्थियों को इसकी जानकारी नहीं थी जिसका 05 प्रतिशत है। अर्थात् गर्भावस्था के दौरान किसका टीका लगाया जाता है यह जानकारी लगभग 95 प्रतिशत है।
तालिका क्रमांक 6 गर्भावस्था के दौरान आयरन की गोली खाने के संबंध में विचार
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Ø- |
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1- |
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30 |
75% |
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2- |
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10 |
25% |
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40 |
100% |
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उपर्युक्त तालिका विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि आयरन की गोली आवश्यक है या खाने के संबंध में 30 उत्तरदाताओं ने अपना विचार किया है कि खानी चाहिए, जिनका प्रतिशत 75 है और 10 उत्तरदाताओं ने बताया है कि जरूरी नही है जिनका प्रतिशत अंक 25 है।
तालिका क्रमांक 7 प्रसव हेतु उपयुक्त स्थान संबंधी विचार
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Ø- |
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1- |
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22 |
55% |
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2- |
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3- |
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02 |
05% |
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4- |
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16 |
40% |
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40 |
100% |
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उपर्युक्त तालिका विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि 22 ऐसे उत्तरदाता है जो प्रसव हेतु उपयुक्त स्थान जिला चिकित्सालय को मानते है जिनका प्रतिशत 55 है और स्वास्थ्य केन्द्र पर 0 प्रतिशत रिजल्ट मिला और घर में प्रशव कराने हेतु 02 उत्तरदाताओं ने अपना मत प्रदान किया। जिनका प्रतिशत 5 है। और प्राइवेट अस्पताल में प्रसव कराने हेतु 16 उत्तरदाताओं ने सही माना है जिनका प्रतिशत 40 है। अर्थात् उपर्युक्त विवेचन को देखते हुये यह कहा जा सकता है कि नगरीय अध्ययन से यह स्पष्ट हो गया है कि जागरूकता काफी है। लाभार्थियों में और अपनी स्थिति के अनुसारही उन्होंने प्रसव हेतु उपयुक्त स्थान बताया है।
प्रशिक्षण के संबंध में विचार:
उत्तरदाताओं से साक्षात्कार अनुसूची के माध्यम से यह जानने का प्रयास किया गया कि उन्हें आंगनवाड़ी केन्द्रों के माध्यम से कैसा प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाता है जिसमें हमें अर्थात शोधार्थी को इस प्रकार उत्तर प्राप्त हुये जिन्हें हम निम्न विन्दुओं के अनुसार विभाजित कर सकते है।
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1- |
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14 |
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4- |
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12 |
30% |
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40 |
100% |
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शोधार्थी उत्तरदाताओं द्वारा प्राप्त उत्तरों को तालिकावद्ध रूप प्रदान किया है जिसमें यह स्पष्ट होता है कि केन्द्रों द्वारा प्रशिक्षण किसी न किसी रूप में दिया जाता है लेकिन प्रभावी रूप में नहीं दिया जा रहा है।
3) धात्री माताओं से प्राप्त तथ्यों का विश्लेषण:
शेाधार्थी अपने शोध पत्र कार्य हेतु आंगनवाड़ी केन्द्रों में पंजीकृत धात्री माताओं को भी अपने शोध पत्र कार्य का विषय बनाया है और साक्षात्कार अनुसूच.ी के माध्यम से तथ्यों का संकलन कर है उस अध्याय ने तथ्यों का संकलन कर उस अध्याय ने तथ्यों का विश्लेषण प्रस्तुत किया है।
अध्ययन कार्य के दौरान उत्पन्न कठिनाइयॉ:-
किसी भी अच्छे कार्य को अच्छी तरह से करने के लिये कठिनाइयॉ तो आती ही हैं क्योंकि अच्छे कार्य को करने के लिये मेेहनत, लगन, कार्यकुशलता, इमानदारी, आदि का होना आवश्यक है। शोधार्थी अपने शोध-विषय के अनुरूप क्षेत्र कार्य हेतु साक्षात्कार अनुसूची का प्रयोग करते हुये स्वयं क्षेत्र में गया और शोध संबंधी जानकारी प्राप्त की।
जब शोधार्थी शोध क्षेत्र में गया तो वहॉ उसे एक उत्तरदाता के पास कई-कई बार जाना पड़ा कहीं तो वह घर पर नहीं होता था और कभी व्यस्त होता था। उत्तरदाताओं से मिलने के बाद उन्हें यह विश्वास दिलाने में कठिनाई का अनुभव हुआ कि यह जानकारी गोपनीयता को ध्यान में रखते हुये ली जा रही है। इस जानकारी से किसी का कोई नुकसान नहीं हेागा।
उत्तरदाताओं की जानकारी प्राप्ति हेतु आंगनवाड़ी केन्द्रों में जाना पड़ा जहॉ एक आंगनवाड़ी केन्द्रों में जाना पड़ा जहॉ एक आंगनवाड़ी में कई बार जाने पर भी वह बन्द ही मिलती थी। जहॉ यह भी कठिनाई शोधार्थी द्वारा महसूस की गयी।
शोधार्थी समाज कार्य की छात्रा है जिसके कारण वह समाज कार्य प्रशिक्षण के दौरान प्राप्त सिद्धान्तों, प्रविधियों और निपुणताओं का प्रयोग कर उत्तरदाताओं को अपने साक्षात्कार हेतु तैयार कर लिया लेकिन कुछ प्रश्नों को समझाने में कठिनाई महसूस की गयी।
परिणाम:-
जब हम कोई कार्य करते है तो उसका कुछ न कुछ परिणाम निकलता है चाहे वह परिणाम विषय के अनुकूल हो या फिर प्रतिकूल शोध पत्र कार्य एक निश्चित परिणाम प्राप्त करने के लिये दिये जाते है। क्योंकि हमेशा वह नहीं होता जो हमें दिखाई व सुनाई देता है।
शोधार्थी का शोध विषय आंगनवाड़ी में पंजीकृत गर्भवती, किशोरी तथा धात्री माताओं की जागरूकता का समीक्षात्मक अध्ययन (रीवा नगर के विशेष संदर्भ में) है जिसमें यह देखा जाता है कि कितनी जागरूकता है केन्द्र में पंजीकृत लाभार्थियों में और अपेक्षित परिणाम क्यूॅ नहीं सामने जाते है।
उत्तरदाताओं से किये गये साक्षात्कार से यह परिणाम सामने आया कि मात्र शासन का कार्य आगनवाड़ियों का संचालन देना नहीं है वल्कि उनके कार्यो के करने में नियमों का प्रतिपादन कर उनका देख रेख करें। कहीं तो केन्द्र भी नहीं खुलता तो कटी योजनाओं की कोई जानकारी ही नहीं देता।
निष्कर्ष:-
शोधार्थी अपने शोध पत्र कार्य हेतु ऑगनवाडी केन्द्रों में पंजीकृत किशोरी गर्भवती तथा धात्री माताओं की जागरूकता का समीक्षात्मक अध्ययन विषय के रूप में चुना। शोधकर्ता के मन में जो भी प्रश्न थे (विषय से संबंधित) उनका समाधान प्राप्त करने का प्रयास किया है। और शोध पत्र कार्य के दौरान जो भी निष्कर्ष निकाला गया वह पूर्ण मौलिक है, जिसे हम निम्न विन्दुओं के आधार पर स्पष्ट कर सकते है।
1ण् शोधार्थी अपने शोध पत्र कार्य पूर्ण करने हेतु 20 किशोरियों का चुनाव दैव निदर्शन विधि द्वारा किया है और उनसे विवाह की सही उम्र के संबंध में जाना गया तो सर्वाधिक 20-24 वर्ष के बीच के समय को उपयुक्त मानती है। जिनका प्रतिशत 40 है।
2ण् आंगनवाड़ी केन्द्रों में वजन कराया जाता है लेकिन क्या यह उचित है कराना चाहिये या नहीं के संबंध में जाना गया तो 35 प्रतिशत लाभार्थियों ने बताया कि वजन कराया जाता है जबकि 65 प्रतिशत लाभार्थियों ने बताया कि वजन नहीं कराया जाता है।
3ण् लाभार्थियों से यह जाना गया कि जन्म के तुरंत बाद एक घंटे के अंदर तथा बच्चे की मॉ का दूध, पिला देना चाहिये तो 70 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने इसे सही माना है और 30 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा है कि सही पिलाना चाहिये।
4ण् बच्चों के सम्पूर्ण टीकाकरण के संबंध में जाना गया कि नियमित तौर से सभी टीके लगवाने चाहिये तो 35 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने बताया कि हॅा सम्पूर्ण टीकाकरण होना चाहिये।
5ण् जो बच्चे अति कुपोषित है उनको सामान्य बनाने के लिये क्या करना चाहिये या कहॉ भेजा जाता है आदि के संबंध में जाना गया तो 40 प्रतिशत लोगों को ही इसकी जानकारी है जबकि 60 प्रतिशत लोगों को इसकी कोई जानकारी नही है।
6ण् दूध पिलाने से पहले बच्चे को तरल पदार्थ देने के संबंध में जाना गया तो 70 प्रतिशत महिलाओं ने इसे सही माना है। क्योंकि वह आज भी दाई के बताये नुक्शों पर विश्वास करती है।
सुझाव:-
परिवर्तन की गति कभी रूकती नहीं है। परिवर्तन एक शास्वत प्रक्रिया है। उसकी गति में जरूर बदलाव होता रहता है, और कुछ समय में परिवर्तन की गति तेज हुई है। इसके साथ ही महिलाओं की स्थिति में भी उल्लेखनीय परिवर्तन हुये है।
प्रस्तुत अध्ययन में अंागनवाड़ी केन्द्रों में पंजीकृत किशोरी, गर्भवती, तथा धात्री माताओं की जागरूकता का समीक्षात्मक अध्ययन रीवा नगर के विशेष संदर्भ में) से संबंधित प्रश्नों की तालिका का निर्माण किया गया। और जो निष्कर्ष सामने आया उसी के आधार पर सुझाव प्रस्तुत किया गया।
1ण् केन्द्र में पंजीकृत समस्त किशोरियों को प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध कराना।
2ण् किशोरावस्था में ही बालिकाओं में अनेक शारीरिक परिवर्तन होते है अर्थात् किशोरियों को इस संबंध में जानकारी उपलब्ध कराने हेतु कार्यक्रमेां का आयोजन करना चाहिये।
3ण् आगनवाड़ी केन्द्रों में पंजीकृत गर्भवती महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जाना चाहिये।गर्भ के दौरान जो भी टीकाकरण, आयरन की गोलियॉ आदि से होने वाले लाभ-हानि का स्पष्ट विवरण देना चाहिये।
4ण् आंगनवाड़ियों का संचालन हो जाने से समस्याएॅ समाप्त नहीं जायेगी। अर्थात् उसके कार्य संचाल हेतु विशेष ध्यान देना चाहिये।
5ण् प्रसव हेतु उपयुक्त स्थान के संबंध में भी कार्यकर्ता को जानकारी देनी चाहिये। और अस्पताल में होने वाली कार्य प्रणलियों पर भी विशेष ध्यान देना चाहिये।
6ण् कई कार्यक्रमेां का संचालन आंगनवाड़ी केन्द्रों के माध्यम से किया जाता है। लेकिन केन्द्र में पंजीकृत लाभार्थियों को जब तक इस संबंध में जानकारी प्राप्त नहीं होगी कि वास्तव में यह कार्य हमारे लिये कितना जरूरी है तब तक जनता अपना रूझान योजनाओं की ओर नहीं देगा। अर्थात वजन से संबंधित लाभों के बारे में भी बताया जाना चाहिये।
समीक्षा:-
शोधार्थी अपने शोध पत्र कार्य हेतु नगर में स्थापित ऑगनवाड़ियों का चयन कर पंजीकृत लाभार्थियों को अपने शोध विषय के मूल्यांकन हेतु उत्तरदाता के रूप में चुना और साक्षात्कार अनुसूची के माध्यम से वह जिस निष्कर्ष पर पहुॅचा उसे हम निम्न बिन्दुओं के आधार पर समझ सकते है।
1ण् उत्तरदाताओं से जब विवाह के सम्बन्ध में जाना गया कि विवाह की सही उम्र क्या होनी चाहिये तो उत्तरदाताओं का जवाब यह सामने आया कि 20 से 24 वर्ष के बीच की उम्र सही होती है।
2ण् केन्द्र में पंजीकृत किशोरियों में जागरूकता काफी है लेकिन उन्होनें यह भी स्पष्ट किया कि यह जानकारी उन्हें ऑगनवाड़ी कार्यकर्ता से प्राप्त नहीं होती है। बल्कि अन्य माध्यमो से प्राप्त होती है।
3ण् पंजीकृत लाभार्थियों से उनके खान-पान और स्वास्थ्य तथा स्वच्छता के सम्बन्धित विचार जाना गया तब भी यह निष्कर्ष सामने आया कि वह जागरूक अन्य माध्यमों से है।
4ण् जन साधारण कि यह एक आम धारणा बन गयी है कि शासन जिन योजनाओं का संचालन कर रहा है वह मुझे घर बैठे कुछ करना न पड़े और प्राप्त हो जाये योजना की प्रभावशीलता, उद्देश्य, जागरूकता आदि से कोई मतलब जनसाधारण नहीं रखना चाहते है।
संदर्भ ग्रन्थ सूचीः-
1ण् राय, पारसनाथ (1973) अनुसंधान परिचय, लक्ष्मीनारायण अग्रवाल आगरा।
2ण् शुक्ला एस0एम0, सहाय एस0पी0 (2005) सांख्यिकी के सिद्धान्त साहित्य भवन पब्लिकेशन हास्पिटल रोड़ आगरा।
3ण् पाण्डे तेजस्कर, पाण्डेय ओजस्कर (2009) समाज कार्य भारत बुक सेंटर 17, अशोक मार्ग, लखनऊ।
4ण् गुप्ता एम.एल, शर्मा डी.डी. (1998) समाजशास्त्र साहित्य भवन पब्लिकेशन आगरा,
पत्र एवं पत्रिकाएॅ
1. शक्ति:-
महिला एवं बाल विकास विभाग, मध्यप्रदेश शासन द्वारा प्रकाशित सं. क्रं. 1865/23 जुलाई 2010
2. भारतीय महिला स्वास्थ एवं पोषण:-
महिला एवं बाल विकास मध्यप्रदेश शासन द्वारा प्रकाशित सं. क्रं. 1865/23 जुलाई 2010
3. स्वस्थ्य बच्चे भारत का भविष्य:
महिला बाल विकास विभाग, मध्यप्रदेश शासन द्वारा प्रकाशित सं0 क्र0 1865/23 जुलाई 2010
4) जागृति -
महिला बाल विकास विभाग, मध्यप्रदेश शासन द्वारा प्रकाशित स. क्र. 1865/23 जुलाई 2010
समाचार पत्र -
1) दैनिक भास्कर
2) दैनिक जागरण
WEB SITE
1. www. google.com
2. www. mpwcdnic.in
Received on 26.03.2022 Modified on 10.04.2022
Accepted on 20.04.2022 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2022; 10(1):41-48.